Lahare - Sukoon Ya Tabahi

स्नेहल, एक निष्पाप और मासूम लड़की। जवान, दिखने में लाजवाब और दिल की सच्ची। नौकरी के सिलसिले में अपने घरवालों से दूर एक शहर में अकेली रहती है। ऑफिस का काम और अपना घर—यही उसकी दुनिया है। ऑफिस में ही उसकी एक अच्छी दोस्त और सहेली है। इस शहर में वही एक है, जिसके साथ वह खुलकर अपने मन की बातें साझा कर सकती है।

अचानक कुछ ऐसी घटनाएँ घटती हैं कि उसके मन की नगरी में दो युवक प्रवेश करते हैं। धीरे-धीरे पहचान बढ़ती है और फिर शुरू होता है दोस्ती का एक ऐसा दौर, जहाँ वह खुद को ही भूल जाती है। उसे लगने लगता है कि दोस्ती का यह रिश्ता कुछ अलग ही है।

जब वे तीनों अपनी-अपनी जिंदगी, काम और दोस्ती में मगन होते हैं, तभी जिंदगी उसे एक ऐसे रास्ते पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ वह एक पेचीदा निर्णय लेने पर मजबूर हो जाती है। तीनों की जिंदगियाँ उसके इस निर्णय से दांव पर लग जाती हैं।

देखते-देखते हालात बिगड़ जाते हैं और जिंदगी इस मासूम-सी लड़की को प्यार के मुलायम रास्ते से उठाकर सीधे कानून की सख्त चौखट के सामने खड़ा कर देती है। एक खून हो जाता है और उसकी गुत्थी सुलझाना मुश्किल हो जाता है। प्यार और अपनापन से शुरू हुई यह कहानी अचानक हत्या के जाल में उलझ जाती है। सच क्या है और झूठ क्या—यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है। सब रास्ते जैसे बंद हो जाते हैं।

ऐसे में उसकी मदद कौन करेगा? क्या कोई उसे बचाने आएगा? असली कातिल कौन है? कौन हटाएगा उस पर से वह काली परछाई?

हल्की-फुल्की प्रेम कहानी, दिल खोलकर निभाई गई दोस्ती, दिमाग को झनझना देने वाला रहस्य और बांधकर रखने वाला कोर्टरूम ड्रामा—इन सबमें पिरोई हुई एक रोमांचक कादंबरी।